प्रशांत किशोर: कितने पेशेवर, कैसे रणनीतिकार और किस स्तर के राजनेता?

प्रशांत किशोर ने बिहार में ग्रास रूट पर अपना अभियान शुरू किया जिसे जन सुराज अभियान का नाम दिया। पीके का कहना है कि 2 अक्टूबर, 2022 से शुरू किए गए इस अभियान के तहत बिहार के 5000 से ज़्यादा गांवों में पैदल चल के जा चुके हैं। हालांकि वो बिहार के सभी गांवों में इस महत्वाकांक्षी अभियान के तहत पहुँचने के लक्ष्य से पीछे भले रह गए हों, लेकिन इसके बाद 2 अक्टूबर, 2024 को बनाई गई उनकी पार्टी, जन सुराज पार्टी ने बिहार की सियासत में पर्याप्त हलचल पैदा कर दी है। उनकी पार्टी का दृष्टिकोण “शिक्षा, रोजगार, और सुशासन” पर केंद्रित है, जो बिहार की दीर्घकालिक समस्याओं—जैसे प्रति व्यक्ति आय (2023 में ₹57,000, राष्ट्रीय औसत ₹1.7 लाख की तुलना में), 40% से अधिक गरीबी दर, और 23% बेरोजगारी दर (CMIE डेटा, 2023) और पलायन को संबोधित करने का प्रयास करता है।

 उनकी पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहेगा, उससे भी ज़्यादा बिहार की राजनीति की सभी प्रमुख पार्टियाँ ये अनुमान लगा रही कि किसका नुकसान वो सबसे ज़्यादा करने वाले हैं। 

उप चुनाव में प्रदर्शन 

जन सुराज पार्टी ने बहुत ज़ोर शोर से नवंबर 2024  में हुए उपचुनावों में हिस्सा लिया। प्रशांत किशोर ने बढ़ चढ़ के दावे किए। लेकिन सभी चारों सीटों पर हुए उपचुनावों में NDA ने बाज़ी मार ली। इसमें से पहले -एक सीट NDA तो तीन सीटें INDIA के पास थीं। जन सुराज पार्टी किसी भी सीट को जीतने में नाकाम रही। उसे सभी चारों सीटों पर अकेले लड़ते हुए लगभग 10 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। 

जब पत्रकारों ने प्रेस कान्फ्रेंस में प्रशांत किशोर को उनके दावों की याद दिलाई तो उन्होंने स्वीकार किया कि चुनाव परिणाम उनकी आशा के अनुरूप नहीं रहे। लेकिन अपनी पार्टी का बचाव करते हुए कहा कि डेढ़ महीने पुरानी पार्टी, जिसका चुनाव निशान भी लोगों तक ठीक से नहीं पहुंचा था, उसे 10 प्रतिशत मत मिलना भी छोटी बात नहीं। अपने तथ्य को वैध बनाने की ग़रज़ से वो बीजेपी का हवाला देते हैं कि BJP को बिहार में 10 प्रतिशत मत पाने में 20 बरस लग गए थे। अभी भी बीजेपी का मत प्रतिशत 19.5 है। और जदयू का मत तो 15.4 प्रतिशत ही है।  

पदयात्रा: जागरूकता अभियान या वोट पाने का ज़रिया

पूरे पदयात्रा के दौरान प्रशांत किशोर का ज़ोर कुछ बिन्दुओं पर रहा। तक़रीबन अपनी सभी जनसभा में वही बात दुहराते रहे। पारंपरिक राजनेताओं के उलट वो आम लोगों से काफ़ी तल्ख़ लहज़े में संवाद करते रहे। कभी-कभी तो इतना कड़वा कि एक मशहूर संपादक ने प्रशांत से इंटरव्यू में पूछ लिया कि इस पदयात्रा को ‘डांट या गुस्सा यात्रा’ क्यों ना कहा जाये! अपनी दुर्दशा के लिए आम लोगों को ही ज़िम्मेदार क़रार देते रहे। 

प्रशांत किशोर का तर्क है कि लोग जिस चीज़ के लिए वोट करते हैं, वो कम या ज़्यादा उनको मिलता ही है। उनका कहना है कि ‘किसको’ वोट दे रहे हैं उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है ‘किसलिए’ वोट दे रहे हैं। 

वो भारी सभा में ग्रामीणों से अपने बच्चों की कसम खाकर हाथ उठाकर बताने को कहते हैं कि आप लोगों में से कितने लोगों ने अपने बच्चों की शिक्षा और रोज़गार के लिए वोट किया है? वो सभा-दर-सभा यही सवाल पूछते हैं और एक भी व्यक्ति हाथ नहीं उठता है। तो वो कहते हैं कि अपनी दुर्दशा के लिए आप लोग ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं जो कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर मतदान करते हैं। 

इसी पदयात्रा में प्रशांत किशोर को एहसास हुआ कि पलायन अमीरों और ग़रीबों दोनों को प्रभावित करता है। ग़रीब बिहार से बाहर मज़दूरी करने तो सम्पन्न घरों के लोगों को भी पढ़ने, इलाज़ और नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ता है। पीके का मानना है कि इस पलायन की वजह से बिहार में परिवार की संकल्पना ही टूट रही है। उनकी ये सब बातें काफ़ी असरदार साबित हो रहीं। जिसके नतीजे में पलायन इस बिहार के विधानसभा में प्रमुख मुद्दा बन चुका है। 

प्रशांत किशोर के अभियान का मीडिया कवरेज अभूतपूर्व है।  एक व्यक्ति जो कभी विधायक या सांसद भी नहीं रहा, उसको इतना मीडिया अटेंशन -हमें केजरीवाल की याद दिलाता है। लेकिन केजरीवाल की कवरेज के पीछे एक देशव्यापी माहौल, अन्ना आंदोलन और राजधानी का होना था।  

बिहार के सभी प्रमुख दल निशाने पर 

सबसे पहले पीके के निशाने पे जदयू और नीतीश कुमार आए। उन्होंने आंकड़ों और तथ्यों के साथ बताया कि नीतीश कुमार की सब कोशिशों के बावजूद आज भी बिहार 2005 में उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले जहाँ था, वहीं है। चाहे वह प्रति व्यक्ति आय हो, शिक्षा हो, रोज़गार हो या पलायन। बिहार बीस साल पहले भी देश में सबसे नीचे था और आज भी। नीतीश ने 2005-2012 के कार्यकाल में कुछ सुधार किए। हत्या और अपहरण कम हुए। सड़क और बिजली आई। लेकिन प्रति व्यक्ति बिजली खपत में बिहार सबसे नीचे है। 2012 के बाद से नीतीश किसी तरह अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में हैं। अब तो उनका स्वास्थ्य ऐसा हो गया है कि वो मुख्यमंत्री बने रहने के लिए फिट भी नहीं। 

राजद पर तो उनका हमला सबसे तीखा है। तेजस्वी यादव को बार-बार ‘नौवा फेल’ कहते हैं। पीके का कहना है कि लालू प्रसाद का बेटा होने का अलावा तेजस्वी की पहचान क्या है? वो राजद के नेता हो सकते हैं, अभी बिहार का नेता नहीं हुए हैं। ‘जंगलराज’ पर ज़ोर देते हुए राजद के डीएनए को ही अपराध और भ्रष्टाचार वाला बताते हैं। वो पूछते हैं कि तेजस्वी का बिहार के लिए विजन क्या है और तीन साल नीतीश के साथ मिलकर सरकार में उपमुख्यमंत्री रहते हुए क्या किया?

कांग्रेस और बीजेपी पे निशाना साधते हुए पीके पूछते हैं कि क्या प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को नीतीश कुमार की सेहत की खबर नहीं! इसी तरह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को लालू राज की गड़बड़ियों का पता नहीं था क्या? लेकिन केंद्र में बिहार के सांसदों के समर्थन से केंद्र की सरकार चलती रहे और बिहार को उसके हाल पे छोड़ दिया।

प्रधानमंत्री ने जब मधुबनी में कहा कि सहरसा से नयी श्रमिक ट्रेन चलने से बिहार के श्रमिकों को सहूलियत होगी तो प्रशांत किशोर ने पूरे नैरेटिव को ही बदल दिया। उन्होंने गिरमिटिया मज़दूरों का हवाला देते हुए कहा कि ये तो अंग्रेजी-राज में होता था कि ट्रेनों और शिपों में भरकर मज़दूरों को दूसरे देशों में ले जाया जाता था। मोदी को चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनमें हिम्मत है तो गुजरात में ऐसी ही घोषणा करें कि गुजरात के मज़दूरों के लिए ट्रेनें चलायी जा रहीं जिससे उनको तमिलनाडू या महाराष्ट्र जाने में आसानी हो। गुजरात को तो GIFT सिटी, सोलर पार्क और बुलेट ट्रेन मिल रही। बिहार के साथ ये भेदभाव क्यों?

पीके ने पूछा कि मोदी के 2014 के उस चुनावी वादे का क्या हुआ जिसमें उन्होंने कहा था कि मोतिहारी में बंद पड़ी चीनी मिलें चलवाऊंगा और यहाँ की बनी चीनी की चाय पीयूंगा। पीके ये भी दावा करते हैं कि उनका ये भाषण मैंने ही लिखा था। 

इसी तरह से अमित शाह पे हमला करते हैं कि महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार है और भारत के गृहमंत्री हैं। महाराष्ट्र में बिहारियों को पीटा जा रहा। क्या इस पर उनका कोई बयान आया?

पीके ने बीजेपी के बिहार अध्यक्ष दिलीप जायसवाल के ऊपर प्रेस कान्फ्रेंस करके उन पर सिखों के अल्पसंख्यक कॉलेज पर धोखे से क़ब्ज़ा करने का आरोप लगाते हैं। उनके साथ कॉलेज की स्थापना करने वाले के परिवार के लोग भी बैठे होते हैं। इसके बाद दिलीप जायसवाल का कोई जवाब नहीं आता। इसके अलावा, बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे पर दिलीप जयसवाल से पैसे लेकर दिल्ली में फ्लैट खरीदने के बदले उनके मेडिकल कॉलेज को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्ज़ा दिलवाया है। बीजेपी के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कथित डिग्री फ़र्जीवाड़े पर भी उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस करके खुलासे करने की बात कही है। इन हमलों के बाद पहली बार बीजेपी बैकफुट पे दिख रही है।  

राहुल गांधी ने क्या चुनावों के बाहर बिहार में कोई रात बिताया? उनकी पार्टी के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि बिहारियों का डीएनए ही मज़दूरों का है। और अब बिहार में राहुल गांधी वोट मांगने आए हैं।  

चिराग़ पासवान के साथ यारी या सियासी गठबंधन के आसार 

प्रशांत किशोर बिहार के सभी प्रमुख सियासी खिलाड़ियों पर तल्ख़ हमले करते हैं लेकिन आश्चर्यजनक रूप से चिराग़ पासवान के ऊपर नर्म रुख़ रखते हैं। चिराग़ भी NDA में होते हुए भी प्रशांत किशोर की कोशिश की तारीफ़ करते हैं। देखा जाये तो चिराग़ पासवान भी तेजस्वी की तरह वंशवाद राजनीति से ताल्लुक़ रखते हैं। उनकी स्कूल की पढ़ाई में गैप है और बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में कंप्यूटर साइंस से बीटेक पहले सेमेस्टर के बाद ड्रॉप कर दिया था। फिल्मी कॅरियर की तो वो बात भी नहीं करना चाहते।

प्रशांत किशोर कहते हैं कि कम से कम चिराग़ पासवान जाति-धर्म की सियासत नहीं करते। जबकि सबको पता है कि चिराग़ पासवान मूल रूप से बिहार में पासवानों के नेता हैं। उनके पिता की गठबंधन राजनीति का आधार 6 प्रतिशत वाला उनका पासवान वोट बैंक ही रहा है। ये कुछ ऐसा ही है जैसे जीतनराम मांझी मूसहरों की या मुकेश सहनी निषादों के नाम पर गठबंधन में सियासी मोलभाव करते हैं। इसीलिए जब नितीश कुमार ने दलित और महादलित का बंटवारा किया तो रामविलास पासवान ने सख्ती से इसका विरोध किया था। उसी बुनियाद पर चिराग़ भी दलितों में आरक्षण के बँटवारे का विरोध करते हैं। 

रहस्य क्या है? पीके से चिराग़ का रब्त पुराना है। IPAC के कुछ इनसाइडर्स का कहना है कि चिराग़ का नारा ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ भी IPAC से आया है। प्रशांत किशोर ये भी कहते हैं कि किसी के साथ भी जनसुराज पार्टी का गठबंधन नहीं होगा। जन सुराज पार्टी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। जिसको मेरे साथ आना हो पार्टी का विलय करे।

उदाहरण के लिए आरसीपी सिंह की पार्टी का विलय जन सुराज में किया गया। तो क्या प्रशांत किशोर चिराग़ को जन सुराज पार्टी में ही कोई भूमिका देना चाहते थे? हालांकि अभी चिराग़ के इस ऐलान के बाद कि वो बिहार की राजनीति करना चाहते है, प्रशांत कहते हैं कि अगर वो संजीदा हैं तो उनको केंद्र में मंत्री और अपनी सांसदी से त्यागपत्र देकर बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ना चाहिए। 

चिराग़ पासवान को भी बिहार की राजनीति में ऊंचे सियासी मोलभाव के लिए जाना जाता है। पिछली बार 2020 के विधानसभा चुनावों में मोदी के ‘हनुमान’ ने मनमाफ़िक़ सीटें ना मिलने पर NDA से अलग होकर 137 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा। इसमें से ज़्यादातर सीटों पर जदयू के खिलाफ़। लोजपा को लगभग 6 प्रतिशत मत और सिर्फ़ एक विधानसभा सीट पर जीत मिली। लेकिन इसके नतीजे में जदयू को 42 सीटों पर सिमटना पड़ा था। अभी भी NDA में होते हुए भी हाल के बढ़ते अपराध पर टिप्पणी करते हुए चिराग़ ने कहा कि उन्हें शर्म आती है कि ऐसे सरकार का समर्थन कर रहे। उनके इस बयान के कई सियासी निहितार्थ निकाले जा रहे। लोकसभा चुनाव के पहले नीतीश के NDA में आने तक नीतीश कुमार चिराग़ के निशाने पर सबसे ज़्यादा रहते थे। 

प्रशांत किशोर के नाकाम चुनावी अभियान 

2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव, 2013 लोकसभा चुनाव, 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से लेकर 2021 के बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में प्रशांत किशोर और IPAC की चुनावी सफलताएँ भारतीय राजनीति में किवदंतियों का दर्ज़ा हासिल कर चुकी हैं। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि पोलिटिकल कंसल्टेंसी को प्रशांत किशोर ने भारतीय चुनावी राजनीति में एक डोमेन के रूप में स्थापित कर दिया जो अब किसी भी प्रमुख राजनीतिक पार्टी के लिए अपरिहार्य बन चुका है।

लेकिन लोग कहते हैं कि प्रशांत किशोर ने सियासी दांव लगाने के लिए अपने घोड़े भी बहुत बुद्धिमानी से चुनते हैं। पीके के ज़्यादातर क्लाइंट राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी थे जिनका सालों से प्रदेश या देश की राजनीति में बोलबाला था। इसके बावजूद उनकी चमकदार सफलताओं में उनकी नाकामियाँ छुप जाती हैं। 

2017 में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस की असफलता को वो अक्सर अपवाद के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। उसको छोड़ भी दें तो प्रशांत किशोर ने 2020 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना को मदद किया था। भले ही उद्धव ठाकरे कांग्रेस और राष्ट्रवादी की मदद से मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन शिवसेना जो तब बीजेपी के साथ गठबंधन में लड़ी थी, उसे 288 की विधानसभा में 56 सीटें ही मिल पायी थी। 

प्रशांत किशोर और IPAC की सलाह पर तृणमूल कांग्रेस ने गोवा विधानसभा में ज़ोर शोर से चुनाव लड़ा मगर खाता भी नहीं खोल सकी। इसी तरह, IPAC ने तेलंगाना में BRS के चुनावी अभियान का ज़िम्मा लिया था। के। चन्द्रशेखर राव से मिलने ख़ुद प्रशांत किशोर गए थे। मगर तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी ने रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में बहुमत हासिल किया। 2024 के विधानसभा चुनाव को मैं जानबूझकर छोड़ दे रहा हूँ जिसमें जगन रेड्डी के चुनावी अभियान का ज़िम्मा IPAC के पास था।

तब तक प्रशांत किशोर ने कहना शुरू कर दिया था कि मेरा IPAC से कोई लेना देना नहीं। पीके चुनाव से पहले जगन के प्रतिद्वंदी एन चंद्रबाबू नायडू से भी मिलने गए थे जिसके बारे में उनका कहना था कि वो सिर्फ़ ये स्पष्टीकरण देने गए थे कि इस विधानसभा चुनाव में उनका कोई दख़ल नहीं। बाद में उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में जगन रेड्डी की बड़ी हार की भी भविष्यवाणी की थी। 

प्रशांत किशोर की सियासी विसंगतियाँ 

प्रशांत किशोर ने पदयात्रा की शुरुआत में ही एक ऐसा नैरेटिव सेट किया था जिसने काफ़ी ध्यान खींचा था। उनका कहना था कि बिहार में 1250 परिवारों से सम्बद्ध लोग ही विधायक और सांसद बनते हैं। उनका कहना था वो ये नेक्सस तोड़ना चाहते हैं ताकि बिहार के आम युवा अपनी प्रतिभा के बल पर राजनीति में अपना मक़ाम हासिल कर पाएँ। पीके ने जदयू में रहते हुए भी यूथ इन पॉलिटिक्स (YIF) नाम से एक अभियान चलाया था। उन्होंने उदाहरण दिया कि बीजेपी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना हुआ या फिर उपमुख्यमंत्री, उनको भी सम्राट चौधरी ही मिले, जिनके पिता शकुनि चौधरी अलग-अलग पार्टियों से कई बार के विधायक और मंत्री रह चुके हैं। 

इसके अलावा प्रशांत ने कहा था कि जन सुराज पार्टी का अध्यक्ष चुनाव के ज़रिये चुना जाएगा। उन्होंने ये भी कहा था कि पार्टी का पहला अध्यक्ष अनुसूचित जाति/जनजाति, उसके बाद अति पिछड़ा/पिछड़ा, मुसलमान फिर किसी सवर्ण को बनाया जाएगा। इसके बचाव में उनका कहना था कि उस वर्ग के सबसे क़ाबिल आदमी को चुना जाएगा।  

जन सुराज पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष तो अनुसूचित जाति से आने वाले विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी मनोज भारती को बनाया गया। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजपूत जाति के उदय सिंह को बनाया गया जो ख़ुद दो बार भारतीय जनता पार्टी से सांसद रहे हैं और 2019 लोकसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी से लड़ चुके हैं। क्या कोई चुनाव हुआ? क्या उदय सिंह उसी 1250 परिवार से नहीं आते हैं? इसके अलावा तेजस्वी की शिक्षा पर सवाल उठाने वाले प्रशांत की पार्टी के अध्यक्ष उदय सिंह के बारे में कहा जा रहा वो ख़ुद इंटर तक ही पढ़े हैं। 

इसके अलावा, उदय सिंह के बारे में कहा जा रहा कि उन्होंने पार्टी को ढेर सारा फंड दिया है जिसकी वजह से उनका पार्टी और प्रशांत किशोर पर ज़रूरत से ज़्यादा असर है। प्रशांत ख़ुद पटना में उदय सिंह के दिये घर शेख़पुरा हाउस में ही रहते हैं। 

इसी प्रकार, 2024 के विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी ने पहले अकेड्मिशियन खिलाफ़त हुसैन को उम्मीदवार बनाया लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। जिसके बाद ताज़ा चेहरों का वादा करने वाले प्रशांत ने उनकी जगह मोहम्मद अमजद को बेलागंज विधानसभा से उम्मीदवार बनाया जो 2005 और 2010 में जदयू से चुनाव लड़ चुके हैं। इसके पहले भोजपुर ज़िले की की तरारी सीट से काफ़ी धूमधाम से पूर्व वाइस चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ़ लेफ्टिनेंट जेनरल श्री कृष्णा सिंह को पार्टी का उम्मीदवार बनाया था।

बाद में पता चला कि राज्य के इलेक्टोरल रोल में उनका नाम ही नहीं है। मज़बूरी में उनकी जगह पर कविता सिंह को पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया तो कहा गया कि जन सुराज पार्टी को दूसरी पारंपरिक पार्टियों की तरह चुनाव लड़ने के बारे में काफ़ी कुछ सीखना बाक़ी है। 

प्रशांत किशोर ने ये भी कहा था कि जन सुराज पार्टी नवंबर, 2025 में होने वाले चुनावों के 6 महीने पहले ही उम्मीदवारों की घोषणा कर देगी। अगस्त चल रहा और अभी तक जन सुराज पार्टी ने एक भी उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है। जन सुराज पार्टी के युवा इकाई अध्यक्ष पूर्व आईपीएस आनंद मिश्रा ने व्यक्तिवाद का आरोप लगाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया और पार्टी भी छोड़ दिया। 

बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी के ऊपर प्रशांत ने आरोप लगाया कि उन्होंने समस्तीपुर की अपनी सांसद बेटी शांभवी चौधरी के लिए LJP (R) का टिकट ख़रीदा था। उनके इस आरोप के लिए अशोक चौधरी ने उन पर अदालत में मानहानि का मुक़दमा किया है। लेकिन उससे भी ज़्यादा मानीखेज़ अशोक चौधरी की ये दलील है कि प्रशांत किशोर मुझ पर तो ये इल्ज़ाम लगाते हैं कि मैंने टिकट ख़रीदा लेकिन ये नहीं बताते कि किससे ख़रीदा? वो मुझे तो बेईमान और LJP (R) के अध्यक्ष चिराग़ पासवान को अच्छा आदमी बताते हैं। प्रशांत किशोर ने बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद किसी कैंपेन की ज़िम्मेदारी लेने से मना किया था। लेकिन चेन्नई में सुपरस्टार विजय थलापति के पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अगले चुनावों के बाद जब विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन जाएंगे तो महेंद्र सिंह धोनी को पीछे छोड़कर मैं तमिलनाडु में सबसे मशहूर बिहारी बन जाऊंगा।

निष्कर्ष

प्रशांत किशोर ने दावा किया है कि 2025 के विधानसभा में अगर नीतीश कुमार की पार्टी 25 सीट से अधिक जीतती है तो वो सियासत से सन्यास ले लेंगे। पहले पीके ने 20 सीटों की ही बात की थी। अभी उन्होंने अपना आंकड़े में सुधार किया है। फिर भी बिहार की सियासत समझने वाले इस दावे को भी बहुत जोख़िम भरा मानते हैं क्योंकि अभी तक नीतीश कुमार हर बार अपनी राख़ से उठ खड़े होते रहे हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव इसकी ताज़ातरीन मिसाल है। 

वो कहते हैं जन सुराज पार्टी या तो अर्श पर रहेगी या फर्श पर- बीच में नहीं। उनकी पार्टी की शुरुआती असफलताएं और आंतरिक विसंगतियां उनके सामने बड़ी चुनौतियां पेश करती हैं। क्या वह बिहार की जटिल सियासत में अपनी जगह बना पाएंगे, या उनकी रणनीति और आकर्षण केवल चर्चा तक सीमित रह जाएँगे? यह 2025 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट होगा। 

(दीपांकर शिवमूर्ति लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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